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कहां बनाएं आशियाना : VASTU FOR HOME IN HINDI

Posted by Rameshwar Prasad in Vastu Blogs
vastu for home in hindi

वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार अ वर्ग वालों को मुहल्ले के पूरब में, क वर्ग वालों को दक्षिण-पूर्व में, च वर्ग वालों को दक्षिण में, ट वर्ग वालों को दक्षिण-पश्चिम में, त वर्ग वालों को पश्चिम में, प वर्ग वालों को उत्तर-पश्चिम में, य वर्ग वालों को उत्तर में तथा श वर्ग वालों को उत्तर-पूर्व दिशा में रहना लाभदायक रहता है।

वास्तुशास्त्र में यह मान्यता है कि यदि नगरों का निर्माण किए जाते वक्त ही वास्तु के नियमों का ध्यान रखा जाए, तो उन नगरों का विकास शीघ्र होता है तथा वहां रहने वाले लोग सुखी-संपन्न होते हैं।

नगर के उत्तर में यदि यदि कोई बड़ी नदी बहती हो, तो उस नदी के दक्षिणी तट पर स्थित नगर काफी विकसित होते हैं, जबकि उत्तरी तट पर स्थित नगर उतने विकसित नहीं होते। इसी प्रकार जिन नगरों के पूरब में नदी बहती है, वहां के लोग काफी सुखी-संपन्न होते हैं, मगर जिस नगर के पश्चिम में नदी बहती है, उसका विकास अपेक्षाकृत धीमा होता है।

देश:पुरम् निवासश्च, साभावेश्मासनानि च, यद्दीदृश्यमन्यश्च तत्तच्छेभस्करम् मतम्। वास्तुशास्त्रदृते तस्य स्माल्लक्षण निश्चय:, तस्माल्लोकस्य कृपया शास्त्रमेत दुदीर्यते।-(समरांगण सूत्रधार से)

अर्थात देश, नगर, निवास, सभागार, वैश्म (उच्चस्तरीय आवास जैसे-राजमहल, देवालय आदि), छोटे-बड़े आवासीय परिसर तथा आसनपीठ का निर्माण कार्य अगर वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुरूप हुआ हो, तो वह निश्चय ही कल्याणकारी एवं सुखदायक रहेगा तथा उसमें रहने वाले लोग आनंद का उपभोग करेंगे।

वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार जल की उपलब्धता की दिशा, मैदानों (खुली जगहों) की स्थिति तथा पहाड़-पठार आदि की स्थिति को देखते हुए ही नगरों में कॉलोनियों का विकास किया जाना चाहिए।

नगर में रेलवे स्टेशन, सिनेमा हॉल, स्कूल, मंदिर, होटल तथा उद्योगों आदि की स्थापना भी यदि वास्तु के नियमों के अनुरूप उचित दिशा में हो, तो अच्छा रहता है। इससे नगर की संपन्नता बढ़ती है और वहां रहने वालों पर इसका सार्थक असर पड़ता है।

खुली जगह के लिए उत्तरी एवं पूर्वी भाग ज्यादा बेहतर रहता है। यहां खुली जगह से तात्पर्य मैदान आदि से है। इस दिशा में यदि कोई जलस्रोत या नदी, झरने आदि हों, तो अच्छा रहता है। पूजास्थल के लिए भी नगर का यह भाग श्रेष्ठï माना जाता है।

बड़े होटल, बहुमंजिली इमारतों आदि का निर्माण शहर के दक्षिणी, पश्चिमी या दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में करना चाहिए। दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र में ही ऊंचे टी.वी. टावरों आदि का निर्माण किया जाना चाहिए, जबकि बिजलीघर, ट्रांसफॉर्मर आदि का निर्माण दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में लाभदायक होते हैं।

उद्योगों या फैक्ट्रियों आदि की स्थापना नगर के दक्षिणी क्षेत्र में करना चाहिए।

इसी प्रकार बैंकों, बाजार, कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स आदि की स्थापना नगर के उत्तरी भाग में करने से नगरवासियों के आर्थिक प्रगति का द्वार खुलता है।

महत्वपूर्ण भवनों जैसे-सरकारी ऑफिस, स्कूल आदि की स्थापना नगर के केंद्रीय हिस्से में करना चाहिए।

महत्वपूर्ण सरकारी दफ्तरों का निर्माण नगर के पश्चिमी हिस्से में भी किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए यमुना नदी दिल्ली के पूरब में बहती है, इसलिए यमुना के पश्चिमी तट पर स्थित इसका भाग अधिक समृद्ध है और यहां बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हैं, जबकि यमुना के पूर्वी तट पर स्थित भाग (इसे ट्रांस-यमुना कहते हैं) अपेक्षाकृत कम विकसित एवं कम समृद्ध है।

उधर दिल्ली का दक्षिणी, पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र अधिक समृद्ध है। दिल्ली के अधिकांश बाजार जैसे-चांदनी चौक, करोलबाग आदि उत्तरी भाग में ही हैं। चूंकि यह धन के स्वामी कुबेर की दिशा है, अत: ये बाजार बेहद समृद्ध हैं।

जयपुर शहर की स्थापना में वास्तु के नियमों का पालन किया गया है। अत: यह नगर बेहद समृद्ध है। इसकी स्थापना महाराजा सवाई जयसिंह-द्वितीय ने की थी। वे स्वयं एक प्रख्यात गणितज्ञ व ज्योतिषी थे। उन्होंने यहां हवामहल, जंतर-मंतर, सिटी पैलेस आदि का निर्माण वास्तु के नियमों के अनुरूप ही कराया था। इन स्थलों का महत्व आज भी बरकरार है और हर वर्ष इसे देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक आते रहते हैं। जयपुर स्थित मीरा एवं कृष्ण का मंदिर भी पूरी तरह से वास्तु पर आधारित है।

इसी प्रकार भारत के कई अन्य प्रसिद्ध शहर जैसे-कोलकाता, कानपुर, वाराणसी, पटना, लखनऊ आदि नदियों के किनारे बसे हुए हैं और समृद्ध हैं। देश के दक्षिणी-पश्चिमी भाग में स्थित होने के कारण मुंबई तो भारत की आर्थिक राजधानी ही कही जाती है।

जहां तक यह सवाल है कि किस व्यक्ति को नगर के किस हिस्से में रहने से अधिक लाभ मिलेगा, तो इसके लिए सबसे पहले अपनी नामराशि से मेल खाने वाली मुहल्ला राशि का चुनाव करना चाहिए।

इसके बाद उस मुहल्ले में किस क्षेत्र में आपको अपना घर बनाना चाहिए, इसका निर्धारण करना चाहिए।

इसके लिए 'वर्गचक्रम्Ó की मदद ली जा सकती है। जैसे-अ वर्ग वाले लोगों को मुहल्ले के पूरब दिशा में, क वर्ग वालों को आग्रेय (दक्षिण-पूर्व) दिशा में, च वर्ग वालों को दक्षिण दिशा में, ट वर्ग वालों को नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिमी) दिशा में, त वर्ग वालों को पश्चिम दिशा में, प वर्ग वालों को वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा में, य वर्ग वालों को उत्तर दिशा में तथा श वर्ग (श,ष,स) वालों को ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा में रहना लाभदायक रहता है।